SBI को एसएमएस अलर्ट न भेजना पड़ा भारी: दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने ब्याज सहित लौटवाए 1.35 लाख रुपये
नई दिल्ली | रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर लेन-देन का मैसेज न भेजना बैंक की सेवा में कमी है, और इसकी कीमत बैंक को चुकानी पड़ सकती है। दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने यही मानते हुए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को दोषी ठहराया।
आयोग के अध्यक्ष सुरिंदर कुमार शर्मा और सदस्य आदर्श नैन की पीठ ने यह फैसला दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता का पैसा मई से जुलाई 2020 के बीच ग्राहक सेवा केंद्रों के जरिये निकला, और उन्हें इसकी भनक नवंबर 2020 में लगी।
आयोग के आदेश में क्या-क्या तय हुआ
| मद | आदेश |
|---|---|
| लौटाई जाने वाली रकम | 1,35,500 रुपये |
| इस रकम पर ब्याज | शिकायत दर्ज होने की तारीख से 9% सालाना |
| मुआवजा | 45,000 रुपये |
| कानूनी खर्च | 25,000 रुपये, 9% ब्याज के साथ |
| दोष का आधार | एसएमएस अलर्ट भेजने का प्रमाण न दे पाना, यानी सेवा में कमी |
स्रोत में 9% ब्याज का जिक्र रकम और कानूनी खर्च के साथ है। मुआवजे पर अलग से ब्याज का उल्लेख नहीं है।
मोटा अंदाज यह है कि 1,35,500 रुपये पर 9% सालाना ब्याज एक साल में करीब 12,195 रुपये बनता है। यह मेरा अपना हिसाब है, आयोग का आंकड़ा नहीं। कुल देनदारी इस पर निर्भर करेगी कि भुगतान कब होता है।
सरिता का मामला: पैसा कैसे गायब हुआ
दिल्ली के वेलकम इलाके की रहने वाली सरिता का एसबीआई की सीलमपुर शाखा में बचत खाता था। शिकायत के अनुसार 25 मार्च 2020 तक खाते में 1,35,046 रुपये जमा थे।
घटनाक्रम कुछ यूं रहा:
- मई से जुलाई 2020: अलग-अलग तारीखों और जगहों से कुल करीब 1,35,000 रुपये निकाले गए। रकम ग्राहक सेवा केंद्रों के जरिये निकली।
- इस दौरान: पंजीकृत मोबाइल नंबर पर एक भी एसएमएस नहीं आया, जबकि मोबाइल नंबर और पहचान पत्र बैंक में अपडेट थे।
- नवंबर 2020: सरिता पैसे निकालने बैंक पहुंचीं तो खाता खाली मिला।
- उसके बाद: शिकायत उपभोक्ता आयोग तक पहुंची और अब आदेश आया है।
छह महीने बाद सच पता चलना ही इस मामले की जड़ है। हर निकासी पर मैसेज आता तो पहली ही बार में गड़बड़ी पकड़ में आ सकती थी।
बैंक की दलील और आयोग का जवाब
बैंक का पक्ष था कि रकम आधार संख्या के जरिये अलग-अलग जगहों से निकाली गई। उसने यह भी कहा कि शिकायत के बाद आंतरिक जांच कराई गई थी।
आयोग ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। उसकी नजर में असली सवाल यह था कि क्या बैंक ने अलर्ट भेजे। बैंक यह साबित नहीं कर पाया कि खाताधारक को निकासी की सूचना भेजी गई थी।
आयोग ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के पुराने फैसलों का हवाला दिया। उसका निष्कर्ष था कि एसएमएस अलर्ट न भेजना बैंक की सेवा में बड़ी चूक और लापरवाही है। आयोग ने यह भी माना कि समय पर सूचना मिलती तो सरिता तुरंत कदम उठाकर नुकसान रोक सकती थीं।
एसएमएस अलर्ट को लेकर नियम क्या कहते हैं
यह फैसला जिस सोच पर टिका है, वह आरबीआई के नियमों में भी दिखती है। भारतीय रिजर्व बैंक के 6 जुलाई 2017 के परिपत्र (RBI/2017-18/15) में बैंकों को कहा गया है कि वे ग्राहकों से इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन के लिए एसएमएस अलर्ट पंजीकृत कराना अनिवार्य रूप से मांगें। rbi
उसी परिपत्र में ग्राहक की जिम्मेदारी की रूपरेखा भी है:
- 3 कामकाजी दिन के भीतर सूचना देने पर: ग्राहक की देनदारी शून्य रहती है, बशर्ते मामला परिपत्र में बताई स्थितियों में आता हो।
- 4 से 7 कामकाजी दिन में सूचना देने पर: ग्राहक की देनदारी सीमित रहती है।
- 7 दिन के बाद: फैसला बैंक की बोर्ड-मंजूर नीति से होता है।
- सबूत का भार: अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में ग्राहक की जिम्मेदारी साबित करने का भार बैंक पर है।
आयोग ने अपने फैसले में इस परिपत्र का हवाला दिया या नहीं, यह उपलब्ध रिपोर्ट से पता नहीं चलता। यह नियम केवल पृष्ठभूमि के लिए है। परिपत्र इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेन-देन पर लागू होता है, और किसी खास मामले में कौन-सी स्थिति बनती है, यह तथ्यों पर निर्भर करता है।
ऐसे फैसले पहले भी आ चुके हैं
सरिता का मामला अकेला नहीं है। कुछ पुराने मामले देखने लायक हैं:
- एसबीआई बनाम जरनैल सिंह (एनसीडीआरसी, 22 जून 2022): जिला फोरम और राज्य आयोग ने एसएमएस अलर्ट न भेजने पर एसबीआई को सेवा में कमी का दोषी पाया था। मामला एनसीडीआरसी तक गया और उसका फैसला ऐसे विवादों में आगे हवाले के तौर पर इस्तेमाल होता है।
- जोधपुर का पेंशनर का मामला: एसबीआई के एक वरिष्ठ नागरिक खाताधारक के खाते से 4 से 12 फरवरी 2019 के बीच रोज 40,000 रुपये निकले और कोई एसएमएस नहीं आया। जिला फोरम के बाद राज्य आयोग ने 28 जुलाई 2023 को बैंक की अपील खारिज की। बैंक एनसीडीआरसी पहुंचा। यह ब्योरा एक सहायक वेबसाइट का है, इसलिए अंतिम स्थिति के लिए मूल आदेश देखना बेहतर होगा।
- एटीएम धोखाधड़ी, दिल्ली राज्य आयोग (7 मई 2025): आयोग ने एसबीआई की अपील खारिज की और 2014 की 20,000 रुपये की निकासी के मामले में 10% ब्याज के साथ रकम लौटाने का आदेश बरकरार रखा। ग्राहक करीब 11 साल कानूनी लड़ाई लड़ता रहा।
तीनों मामलों में एक बात साझा है। बैंक के पास अलर्ट भेजने या ग्राहक की लापरवाही साबित करने का ठोस रिकॉर्ड नहीं था, और आयोगों ने यह कमी बैंक के खाते में डाली।
इस फैसले की सीमाएं
यह जिला स्तर का आदेश है। आम तौर पर इसके खिलाफ राज्य आयोग में अपील का रास्ता खुला रहता है। मैंने जो सार्वजनिक स्रोत देखे, उनमें अपील की जानकारी नहीं मिली, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि पैसा लौट चुका है।
हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है। अगर बैंक के पास अलर्ट भेजे जाने का रिकॉर्ड हो, या खाताधारक ने खुद ओटीपी या विवरण साझा किया हो, तो नतीजा अलग हो सकता है।
खाते से अनजान निकासी दिखे तो क्या करें
यह कोई कानूनी सलाह नहीं है। कदम इसी क्रम में उठाना बेहतर रहता है:
- तुरंत बैंक को सूचित करें। कस्टमर केयर पर कॉल करें और शाखा में लिखित शिकायत दें। रसीद या शिकायत संख्या जरूर लें। आरबीआई की रूपरेखा में पहले तीन कामकाजी दिन सबसे अहम हैं।
- साइबर अपराध पोर्टल पर रिपोर्ट करें। cybercrime.gov.in पर या हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें।
- स्टेटमेंट और पासबुक एंट्री निकलवाएं। हर संदिग्ध निकासी की तारीख, रकम और स्थान का रिकॉर्ड रखें।
- बैंक से अलर्ट का लॉग मांगें। लिखकर पूछें कि उन तारीखों पर आपके नंबर पर कौन-से एसएमएस भेजे गए। इस मामले में यही बिंदु निर्णायक बना।
- बैंक की शिकायत प्रक्रिया पूरी करें। जवाब न मिले तो आरबीआई की एकीकृत लोकपाल योजना के तहत cms.rbi.org.in पर शिकायत की जा सकती है।
- उपभोक्ता आयोग जाएं। ऑनलाइन फाइलिंग के लिए e-Daakhil पोर्टल है। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1915) से शुरुआती मार्गदर्शन मिल सकता है।
बचाव का सबसे सस्ता तरीका यह है कि साल में एक-दो बार शाखा जाकर देख लें कि बैंक में आपका सही मोबाइल नंबर दर्ज है और एसएमएस अलर्ट चालू है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. एसबीआई ने सरिता को कितनी रकम लौटानी है?
आयोग ने 1,35,500 रुपये लौटाने को कहा है, शिकायत दर्ज करने की तारीख से 9% सालाना ब्याज के साथ। इसके अलावा 45,000 रुपये मुआवजा और 25,000 रुपये कानूनी खर्च देना होगा।
2. क्या एसएमएस न आने भर से बैंक हर बार जिम्मेदार माना जाएगा?
जरूरी नहीं। आयोग हर मामले के तथ्य देखते हैं, जैसे पंजीकृत नंबर सही था या नहीं, बैंक के पास अलर्ट भेजने का रिकॉर्ड है या नहीं, और ग्राहक ने खुद कोई जानकारी साझा की या नहीं। इस मामले में बैंक अलर्ट भेजने का सबूत नहीं दे पाया।
3. बैंक ने अपने बचाव में क्या कहा था?
बैंक के मुताबिक रकम आधार संख्या के जरिये अलग-अलग जगहों से निकली और शिकायत के बाद आंतरिक जांच हुई। आयोग ने ये दलीलें नहीं मानीं।
4. अनधिकृत लेन-देन की सूचना कितने दिन में देनी चाहिए?
आरबीआई के 2017 के परिपत्र में बैंक को खबर करने की समय-सीमा के हिसाब से देनदारी तय होती है। तीन कामकाजी दिन के भीतर बताने पर तय स्थितियों में ग्राहक की देनदारी शून्य रहती है। जितनी देर होगी, मामला उतना कमजोर हो सकता है, इसलिए पता चलते ही सूचना दें।
5. उपभोक्ता आयोग में शिकायत कहां और कैसे करें?
शिकायत उस जिले के आयोग में दी जाती है जहां आप रहते हैं या जहां बैंक की शाखा है। फाइलिंग e-Daakhil पोर्टल पर ऑनलाइन भी हो सकती है। दावे की रकम के हिसाब से जिला, राज्य या राष्ट्रीय आयोग तय होता है।
6. क्या यह फैसला सभी बैंकों पर लागू होता है?
यह आदेश सीधे एसबीआई और इसी मामले पर लागू है। लेकिन एसएमएस अलर्ट को सेवा का हिस्सा मानने का तर्क दूसरे बैंकों के विवादों में भी उठाया जाता रहा है।